ये सवाल हज़ारों सालों से दार्शनिकों को भरमाता रहा है. इस क्षेत्र में बहुत अनुसंधान हुए हैं और बहुत से सिद्धांत विकसित किए गए हैं लेकिन किसी एक पर सहमति नहीं बन पाई है. कुछ लोगों का मानना है कि सपने निरर्थक और निरुद्देश्य होते हैं जबकि कुछ का कहना है कि सपने हमारे मानसिक, भावात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी हैं. लेकिन, ये सभी मानते हैं कि हमें सपने नींद के रैपिड आई मूवमेंट या आरईऐम चरण के दौरान आते हैं. रैपिड आई मूवमेंट का मतलब है, बंद आंख के भीतर पुतलियों का तीव्र गति से इधर उधर घूमना. एक रात की नींद में 4 या 5 बार आरईऐम के चरण आते हैं. शुरु में ये काफ़ी छोटे होते हैं लेकिन रात बीतने के साथ साथ ये लंबे होते जाते हैं. इस चरण में हमारी आंखों की पुतलियां तेज़ी से घूमती हैं, हमारे मस्तिष्क की गति तेज़ हो जाती है जबकि हमारी मांसपेशियां बिल्कुल शिथिल पड़ जाती है.
इस सिद्धांत के मानने वालों का कहना है कि जागृत अवस्था में हमारा मस्तिष्क निरंतर संदेश ग्रहण करने और भेजने का काम करता रहता है. जिससे हमारा शरीर गतिशील बना रहता है. लेकिन जब हम नींद के आरईऐम चरण में होते हैं तो हमारा शरीर शिथिल हो जाता है जबकि हमारा मस्तिष्क और गतिशील हो उठता है. ऐसी स्थिति में सपने शारीरिक गतिविधि का स्थान ले लेते हैं. जाने माने मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रॉयड का यही मानना था कि सपने हमारी अचेतन इच्छाओं और विचारों के प्रतिनिधि होते हैं. क्योंकि हम जागृत अवस्था में इन्हें व्यक्त नहीं कर सकते इसलिए इन्हें अचेतन मन में धकेल देते हैं और जब हम नींद में होते हैं तो ये सपनों के रूप में प्रकट होते हैं. लेकिन जब तक ये सिद्धांत प्रमाणित या अप्रमाणित नहीं होते कुछ कहना कठिन है.
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